बिहार के मुज़फ्फ़रपुर ज़िले में बहुत-सी मलिन बस्तियों के बच्चों के लिए जून का महीना पिछले 15 वर्षों से जानलेवा बना हुआ है.
इसी महीने एक ऐसा घातक रोग वहाँ फैलता है, जो ख़ासकर डेढ़ साल से आठ साल तक की उम्र वाले बच्चों पर हमला करता है.
चिकित्सा विशेषज्ञ इसे मस्तिष्क-ज्वर ( एन्सेफेलायटिस ) जैसा रोग बताते हैं पर निश्चित पहचान अभी भी नहीं हो पाने की बात स्वीकार करते हैं.
आरोप है कि लापरवाही के चलते वहां तब तक बीमार बच्चों में से दस की मौत हो चुकी थी. हालांकि अस्पताल प्रबंधन ने लापरवाही के आरोप को निराधार कहा है.
जनता दल(यू) से जुड़े तीन विक्षुब्ध सांसद - उपेन्द्र कुशवाहा, मंगनी लाल मंडल और अरुण कुमार वहां मरीज़ों को देखकर निकलते समय रोष में कह रहे थे कि नीतीश सरकार द्वारा स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार संबंधी खोखले दावे अब बेनक़ाब हो रहे हैं.
'मतभेद'
इस बीच इलाज को लेकर चिकित्सकों में मतभेद भी दिखने लगे हैं. सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के चिकित्सक कहते हैं, ''यह एनसेफ़ेलायटिस ही है, ऐसा अबतक प्रमाणित हुआ नहीं है, इसलिए 'एंटी वायरल ड्रग' चलाना ठीक नहीं.''
दूसरी तरफ़ केजरीवाल अस्पताल के चिकित्सक डॉ. राजीव का कहना है, ''लक्षणों के आधार पर और दिल्ली से आए चिकित्सा विशेषज्ञों की सलाह पर इस रोग का इलाज हम 'एंटी वायरल ड्रग' देकर कर रहे हैं .''
उनके मुताबिक़ पुणे के लैब में इस बाबत हो रही सैम्पल - जांच की रिपोर्ट एक सप्ताह में मिल जाने की सभावना है. ऐसे में अनुमान पर चल रहे इलाज को भगवान भरोसे छोड़ने जैसी ही विवशता मान लिया गया है.
मुज़फ्फ़रपुर के दोनों अस्पतालों में मैंने जिन 25 बच्चों को इस रोग से ग्रस्त देखा, उनमें से अधिकांश बेहोशी की हालत में जीवन और मौत के बीच फंसे दिख रहे थे.
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी चौबे ने कहा है कि इस रोग से ग्रस्त सभी बच्चों की ना सिर्फ़ मुफ़्त चिकित्सा हो रही है बल्कि रोग की सही पहचान और सटीक दवा संबंधी तमाम प्रयासों में राज्य सरकार सक्रिय योगदान कर रही है.
लेकिन मौक़े पर वास्तविक हालात देख रहे लोगों की राय या प्रतिक्रिया इस सरकारी दावे से बिलकुल भिन्न और खिन्न नज़र आती है
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